देवियों का गढ़ है छत्तीसगढ़
नवरात्रि पर्व विशेष आलेख
अनादि काल से देवी उपासना का केंद्र छत्तीसगढ़ रहा है। पुराने जमाने में यहां के सामंतों जमीदारों और राजा महाराजाओं ने कुलदेवी की स्थापना की है।यहां खेत- खलिहान,डोंगरी- पहाड़,गांव -शहर में देवियों का वास होता है।
छत्तीसगढ़ महतारी क्यों?
आपको बताते चलें कि संभवतः दुनिया का कोई भी देश अपने देश को माता नहीं कहता।भारतवासी कहते हैं भारत माता।भारत के किसी भी राज्य के लोग अपने राज्य को माता नहीं कहते। छत्तीसगढ़ के लोग कहते हैं छत्तीसगढ़ महतारी। दरअसल छत्तीसगढ़ के कण-कण में देवी मां अपने विविध रूप- नाम से विराजती है। छत्तीसगढ़ में पांच प्रमुख ऐसे धार्मिक स्थल है जिन्हें श्रद्धालुजन शक्तिपीठ की तरह विशेष महत्व देते हैं। जिनमें डोंगरगढ, दंतेवाड़ा, चंद्रपुर, रतनपुर और खल्लारी शामिल है।शक्ति पीठ ऐसे पूजा स्थलों को कहते हैं,जहां कि माता सती के निष्प्राण शरीर से विभिन्न अंग गिरे थे। माता सती के मृत देह को लेकर शिव जी ने तांडव करते ब्रह्मांड का विचरण किया था। इस दौरान माता सती के अंग जहां-जहां गिर गए उन स्थलों को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता मिली है।
शक्ति स्वरुपा मां दुर्गा छत्तीसगढ़ की अधिष्ठात्री है। देवी के छोटे बड़े मंदिरों में नवरात्रि पर्व पर अखण्ड ज्योति जलाने,और जंवारा बोने की प्राचीन परम्परा है। हज़ारों हज़ारों की संख्या में प्रज्वलित ज्योति भक्तजनों को मोहित करती है। दिन-रात जलने वाली ज्योति की देखभाल के लिए सेवक नियुक्त होते हैं। बंद कलश कक्ष में तपिश- धूएं के बीच निष्ठापूर्वक कार्यरत वे ज्योति को बूझने नहीं देते।
रतनपुर की महामाया देवी
बिलासपुर जिले में कोरबा मार्ग पर रतनपुर में महामाया देवी विराजमान है।राजा रत्न देव द्वारा ग्यारवीं शताब्दी में निर्मित मंदिर की कथा है कि वे शिकार के लिए आए थे। तब अर्धरात्रि के समय वहां एक विशाल वृक्ष के नीचे उन्होंने दिव्य प्रकाश को देखा।जिसमें उन्हें आदिशक्ति देवी के दर्शन हुए तब उन्होंने वहां मंदिर का निर्माण करवाया।
मंदिर में महाकाली महासरस्वती और महालक्ष्मी देवी की प्रतिमाएं हैं।ऐसी मानयता है कि रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उनका धड़ अंबिकापुर में स्थित है।यहां निर्मित मंदिर का मंडप सोलह स्तंभों में टिका हुआ है ।गर्भ गृह में मां महामाया की प्रतिमा के पृष्ठ भाग में मां सरस्वती की भी प्रतिमा है। दंतकथा के अनुसार देवी सती का दाहिना स्कंध यहां गिरा था। भगवान शिव ने इस स्थल को कौमारी शक्तिपीठ का नाम दिया था।
चंद्रपुर की चंद्रहासिनी देवी
छत्तीसगढ़ के डबरा तहसील जांजगीर-चांपा जिले के मांड और महानदी के संगम पर स्थित चंद्रपुर में चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां माता सती का बांया कपोल गिरा था।संबलपुर के राजा चंद्रहास ने देवी मंदिर का निर्माण करवाया था।ऐसा माना जाता है कि चंद्रसेनी देवी सरगुजा से आकर यह विराजमान हुई है।देवी का मुख चंद्रमा की आकृति जैसा होने के कारण इन्हें चंद्रहासिनी,चंद्रसेनी मां के नाम से जाना जाता है,
मंदिर परिसर में अर्धनारीश्वर,महाबली हनुमान,द्रोपदी चीर हरण, महिषासुर वध,शेषनाग विष्णु सैया,कृष्ण लीला सहित अनेक विशाल मूर्तियां निर्मित है जिन्हें देखकर सहज ही धार्मिक कथाओं का ज्ञान होता है।
माता के मंदिर से कुछ दूरी पर महानदी के बीच बने टापू में मां नाथल दाई का मंदिर स्थित है।बड़ी बहन चंद्रहासिनी देवी के दर्शन उपरांत छोटी बहन माता नाथलदाई का दर्शन भी अनिवार्य माना जाता है।
दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी
घने वनांचल बस्तर में स्थित दंतेवाड़ा में मां दंतेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर है।चौदहवीं शताब्दी में दक्षिण भारतीय वास्तु कलानुसार निर्मित मंदिर स्थल पर माता सती का दांत गिरा था।ऐसी मान्यता है कि आंध्र प्रदेश के वारंगल से यहां देवी जी का आगमन हुआ और शंखिनी-डंकनी नदी के तट पर वे विराजित हुई। वारंगल के राजाअन्नम देव ने मंदिर का निर्माण कर दंतेवाड़ा नगर बसाया था। मंदिर में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित छः भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा स्थापित है। नक्काशी युक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग में नरसिंह भगवान अंकित है।मंदिर में देवी के चरण चिन्ह मौजूद है।
मंदिर के द्वार पर दांई बांई ओर सर्प और गदाधारी दो द्वारपाल की मूर्ति है। मंदिर के सामने पत्थर से बना गरुड़ स्तंभ भी है।गर्भ गृह और महामण्डप का निर्माण एक ही पत्थर से किया गया है।काष्ठ,खपरैल आदि से निर्मित मंदिर में देवी दर्शन हेतु सीले हुए वस्त्र के बजाय धोती पहनकर जाना होता है।चमड़े से बनी वस्तुएं अंदर ले जाना वर्जित है। मंदिर के पास ही नदी के किनारे भैरव भाइयों का वास माना जाता है इसलिए इस स्थल को तांत्रिकों की साधना स्थली भी कहां जाता है।
डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी देवी
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में शक्ति रूपा मां बमलेश्वरी देवी का मंदिर स्थापित है।लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसे कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। यहां राजा वीरसेन द्वारा मंदिर निर्माण-देवी जी की स्थापना की गई थी।सोलह सौ फीट ऊंची चोटी पर बड़ी बमलेश्वरी मां तथा पहाड़ी के नीचे छोटी बमलेश्वरी मां का मंदिर स्थित है।इन्हें राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है।पहाड़ी से सटा हुआ यहां एक सुंदर जलाशय "कामकंदला" है।
राज्य की सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान देवी दर्शन करने हेतु यहां रोपवे भी निर्मित है।यह छत्तीसगढ़ का एकमात्र देवी स्थल है,जहां की रोपवे है।क्वांरऔर चैत्र मास की नवरात्रि में देशभर से यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं।इसीलिए यहां रेलवे स्टेशन पर अनेक नॉन स्टॉपेज ट्रेन का भी अस्थाई स्टॉपेज बनाया जाता है।धार्मिक पर्यटन दृष्टि से यह देश भर में केंद्र बना हुआ है।
खल्लारी की देवी मां
छत्तीसगढ़ के प्राचीन ऐतिहासिक देवी मंदिरों में खल्लारी माता का मंदिर शामिल है।प्राचीन काल में खल्लवाटिका के नाम से प्रसिद्ध यह स्थल महासमुंद जिले से बत्तीस किलोमीटर दूर है।पहाड़ी के ऊपर माता खल्लारी का मंदिर स्थित है। खल्लारी का अर्थ होता है दुष्टों का नाश करने वाला।पुराने जानकार लोग बताते हैं कि पहाड़ी के उपर खोह में देवी मां की उंगली के निशान थे।श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के कारण यहां मंदिर एवं सुसज्जित सीढ़ियों का निर्माण किया गया।
नौ सौ सीढ़ियों की चढ़ाई उपरांत माता खल्लारी की मनोहारी मूर्ति के दर्शन होते हैं।पहाड़ी के नीचे भी माता का भव्य मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है कि भक्तजनों को पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ने में होने वाली तकलीफ को देखते हुए माता ने अपने कटार को पहाड़ी से नीचे फेंका और जहां कटार गिरा उस स्थल पर शक्ति पीठ की स्थापना हुई।मंदिर का निर्माण चौदहवीं सदी में राजा ब्रम्हदेव के शासनकाल में हुआ।
ऐसी मान्यता है कि महाभारत युग में इस पहाड़ी पर पांडव आए थे।उस पहाड़ी पर भीम के विशाल चरण चिन्ह,भीम चूल्हा और नाव के आकार में एक विशालकाय पत्थर भीम डोंगा,भीम हंडा है।भीम का विवाह राक्षसी हिडिंबा से होने तथा उनके पुत्र घटोत्कच की जन्मस्थली भी इसे कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ के कुछ अन्य प्रसिद्ध देवी मंदिर
छत्तीसगढ़ में देवी मां के और भीअनेक सिद्ध स्थल हैं। जिनमें घुंच्चापाली बागबाहरा की चण्डी मां,धमतरी की बिलाई माता,अगांरमोती माता,रायपुर की बंजारी, कंकाली माता, गरियाबंद में घटारानी जतमई माता, झलमला में महामाया, सूरजपुर में कुदरगढ़ी माता,कोरबा मड़वारानी धमधा में त्रिमूर्ति महामाया मंदिर, बेमेतरा में सिद्धि माता,भद्रकाली मंदिर, कवर्धा में हिंगलाज माता, कोंडागांव में तेलीन सती, बंजारी माता,अम्बिकापुर में महामाया समलेश्वरी देवी माता के मंदिर शामिल हैं।
विजय मिश्रा 'अमित'
पूर्व अति.महाप्रबंधक (जन) एम 8,सेक्टर 2 अग्रसेन नगर पोआ- सुंदर नगर रायपुर( छग) 492013 मोबाइल 98931 20310।