छत्तीसगढ़ / रायपुर

रिमझिम फुहारों के बीच मनीष सागरजी का विवेकानंद नगर में मंगल प्रवेश

 चातुर्मास 9 जुलाई से, जप-तप और आराधना-साधना का चलेगा दौर

रायपुर। चातुर्मास बिताने के लिए उपाध्याय प्रवर मनीष सागरजी महाराज व उनके शिष्यों ने गुरुवार को विवेकानंद नगर में मंगल प्रवेश किया। इसके लिए उन्होंने सुबह 7.30 बजे सदर बाजार जैन मंदिर से विहार किया। साथ में आध्यात्म योगी महेंद्र सागरजी , तीर्थ प्रेम विजय म.सा., साध्वी हंसकीर्ति समेत 10 से ज्यादा श्वेत वस्त्र पहने साधु-साध्वियां थे। आगे पचरंगी पताकाएं, घोड़ा-पालकी और बैंड-बाजे थे। सिर पर कलश लिए महिलाओं के साथ पूरा समाज पीछे चल रहा था। सुबह रिमझिम फुहारों के बीच शाही ठाठ से निकली इस शोभायात्रा की रौनक देखते ही बनती थी‌। 


सदर बाजार से निकली यह शोभायात्रा कोतवाली, महिला थाना चौक से बैरनबाजार होते हुए विवेकानंद नगर की ओर बढ़ी। रास्ते में स्वागत के लिए जगह-जगह समाज के लोग खड़े थे। गुरुजनों के आते ही लकड़ी का पाटा रखकर साबूत चावल की गवली सजाते, फिर वहां पहले से मौजूद भीड़ उस पर नारियल-पैसों की बारिश कर देती‌। स्वागत-सत्कार का यह सिलसिला इतना लंबा चला कि 3 किमी से भी कम सफर तय करने में ही साधु-साध्वियों ढाई घंटे का समय लग गया। विवेकानंद नगर पहुंचने पर संत समुदाय सबसे पहले भगवान संभवनाथ के दर्शन करने जिनालय गए। 15-20 मिनट की विधि पूरी करते हुए देव दर्शन किए। इसके बाद ज्ञान वल्लभ उपाश्रय में विशाल पाटे पर विशाल गवली सजाकर युवा मनीषी एवं उपाध्याय मनीष सागर महाराज का भव्य मंगल प्रवेश कराया गया। इसके बाद धर्मसभा हुई। चातुर्मास समिति, मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों और समाज प्रमुखों ने गुरु भगवंतों द्वारा चातुर्मास की विनती स्वीकार करने पर खुशी जताते हुए उनके प्रति अपने विचार रखे। इनमें चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्याम सुंदर बैदमुथा, कार्यकारी अध्यक्ष पुखराज मुणोत, विजय कांकरिया, पीआर गोलछा, सुपारसचंद गोलछा, सुरेश बरड़िया, नरेश बैदमुथा आदि प्रमुख रहे।

महिलाओं ने गीतों से की वंदना, बच्चों ने नृत्य में दिखाए संस्कार

 

मंगल प्रवेश के खास मौके पर समाज की महिलाओं-पुरुषों  और बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। लोढ़ा विंग्स, जागृति बहू मंडल, वल्लभ महिला मंडल ने गीतों से गुरु वंदना की। सुरेश भंसाली ने भी स्वागत में गीत गाए। इसके अलावा विचक्षण विद्यापीठ के बच्चों ने नृत्य में जैन धर्म की संस्कृति और संस्कारों का प्रदर्शन किया। धर्मसभा में बताया गया कि इस बार चातुर्मास के लिए रायपुर पधारे 4 साधु-साध्वियां इसी शहर के हैं। धर्मसभा में मौजूद भीड़ ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनके वीर माता-पिता की अनुमोदना की। 142 उपवास करने वाले बेंगलुरु के तपस्वी राजेश मेहता भी यहां मौजूद थे। पाट पर विराजे गुरुजनों ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीसंघ ने भी सम्मान किया। 
 


जो संस्कार घर में ही मिल जाने चाहिए उसे सीखाकर संत भी थके: महेंद्र सागर 
 

धर्मसभा में अध्यात्म योगी महेंद्र सागर महाराज ने समाज के मौजूदा ताने-बाने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि धर्म के तीन घटक (समाज, संस्कार और संगठन) होते हैं। तीनों में विघटन हो रहा है। मत-पंथ, गच्छ में समाज बंट रहा है। जो संस्कार घर में ही मिल जाने चाहिए, चातुर्मास में आपको वही सब सीखा-समझाकर अब साधु-संत भी थक चुके हैं। मंदिर बनाना आसान है। मंदिर में भक्त लाना बड़ा कठिन है। पहले कम पढ़े लिखे ज्यादा थे। आज ज्यादा पढ़े-लिखे होने के बाद भी समझ कम हो गई है। अपने भीतर जिज्ञासा पैदा करिए। जापान की एक युवती बनारस में मिली थी। इंडियन साइकोलॉजी समझने आई थी‌। इसके लिए उसने 24 भारतीय भाषाएं सीखी थी। उसका कहना था कि उसे मोक्ष की प्रक्रिया समझनी है। पूरी दुनिया में ऐसी अवधारणा कहीं नहीं है। आपको तो सब फ्री मिल रहा है। इसकी कीमत क्यों नहीं समझते!

सबकी ड्यूटी पूरी कर ली, अपनी आत्मा के कर्तव्यों का पालन नहीं किया: मनीष सागर 
 

युवा मनीषी मनीष सागर ने कहा, मार्च क्लोजिंग से पहले सारे काम आप खुद निपटा लेते हैं। किसी को बोलने की जरूरत नहीं पड़ती। धर्म ऐसा काम है, जिसके लिए आपको दूसरों के बोलने की जरूरत पड़ती है। दूसरों के भरोसे जिंदगी नहीं जी जाती ‌। धर्म की भावना जब तक भीतर से नहीं आएगी, बाहरी दिखावे से कुछ नहीं होगा। घर-परिवार से ऑफिस-व्यापार तक इस जीव ने सारी ड्यूटी पूरी कर ली। बस इस आत्मा की ड्यूटी नहीं निभाई। जीवन में अगर समस्या है, तो उसका समाधान भी आपके भीतर ही है‌। सालों-साल चातुर्मास करने के बाद भी आपके जीवन में बदलाव नहीं आया है, तो आपको सोचना चाहिए कि मेरे एफर्ट  में कहां कमी रह गई। तीर्थप्रेम विजय म.सा. ने कहा कि जो आश्रम है, वही परिश्रम है। मतलब जो पाप का स्थान है, वही पुण्य का स्थान भी बन सकता है। आराधना में हमेशा ऑनलाइन रहिए। विराधना को ऑफलाइन मोड पर डालिए।

संयोग है तो वियोग भी तय है, इस बीच समय का सदुपयोग करें: हर्षवर्धन सागर
 

विवेकानंद नगर में चातुर्मास के लिए पहुंचे साधुओं में मुनि हर्षवर्धन सागर भी हैं। संयोग ही कहिए कि इसी नगर में पले-बढ़े हैं। लोग उन्हें गीतेश ललवानी के नाम से जानते थे‌‌। 2021 में दीक्षा ली थी। इसके बाद चातुर्मास के लिए पहली बार रायपुर लौटे हैं। पुरानी बातें साझा करते हुए उन्होंने कहा,  एक समय था जब मैं इसी उपाश्रय में आप लोगों के बीच बैठा होता था। गुरु भगवंत की कृपा हुई और आज मैं यहां उनके साथ आप लोगों के सामने बैठा हूं। उन्होंने कहा कि संयोग है तो वियोग भी है। हमें इसी बीच के समय का सदुपयोग करना है। मन के भीतर अध्यात्म के बीज बोने हैं। आत्मा के मोक्ष के लिए गुरु का सानिध्य जरूरी है। आज यह संकल्प लें कि चातुर्मास में प्रतिदिन स्वाध्याय करेंगे। रोज एक नियम लेंगे कि अपने जीवन में क्या बेहतर बदलाव कर सकते हैं।

 

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