स्वयं पर नियंत्रण आवश्यक है, आत्मनियंत्रण ही अनुशासन को दर्शाता है : मनीष सागरजी महाराज
रायपुर। टैगोर नगर पटवा भवन में रविवार को विशेष प्रवचनमाला में परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने जीवन में सुधार का प्रारंभ कहां से करें सभी को समझाया। उन्होंने कहा कि आज से ही नई शुरुआत करें, जिसकी उपेक्षा करना शुरू कर दिए थे उसे वापस अपने निकट लाएं और जिसके प्रति कुछ वहम पाल लिए थे उसे हटाकर सब कुछ अच्छा है ऐसा मानकर जीवन जीने का प्रयास करें और अपने घर परिवार को स्वर्ग जैसा बनाएं। ऐसा करके हम अपने परिवार के साथ आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़े।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि निज पर शासन फिर अनुशासन अर्थात् अपने आप पर नियंत्रण आवश्यक है। आत्म-नियंत्रण ही अनुशासन को दर्शाता है। जब हम अपने विचारों, भावनाओं और कार्यों पर पूरी तरह से शासन कर लेते हैं, तभी हम अनुशासन की ओर बढ़ सकते हैं। अनुशासन केवल बाहरी नियमों का पालन करना नहीं है, बल्कि यह आंतरिक शक्ति और आत्म-नियंत्रण का परिणाम है। ये हमें अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने में मदद करता है।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि हमेशा स्वभाव में शांति, संस्कारों में मर्यादा, समाज में मिलनसारिता और शासन के प्रति समर्पण रखें। यह चार विशेषताएं अपने भीतर डेवलप करें क्योंकि तैयारी नहीं हो तो नाटक भी फेल हो जाता है। यदि जीवन में तैयारी ना हो तो परिवार भी बिगड़ जाता है। आज बच्चे समाज से दूर हो रहे हैं। सबसे पहले अपने बच्चों को सामाजिक बनाएं,समाज से जोड़ें। जैसे हम घर-घर में मंदिर नहीं संघ का मंदिर बनाते हैं ताकि व्यक्ति घर से निकाल कर चार लोगों से मिले और उससे प्रेरणा मिलेगी। कोई तो उदाहरण बनेगा कोई तो आदर्श बनेगा। जब तक सामाजिक नहीं बनोगे तो आध्यात्मिक और धार्मिक कैसे बनोगे। समाज में मिलनसारिता यदि आ जाए तो परिवार में भी मिलनसरिता अपने आप आ जाएगी।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि अनुकूलता में तो सब जीवन जीते हैं प्रतिकूलता में भी हमें जीवन सीखना है। अपनी वे ऑफ़ लिविंग,वे का रिएक्टिंग और वे ऑफ वर्किंग बदलना पड़ेगा। ऐसा कर प्राप्त परिस्थिति में आसानी से जी सकेंगे। इस तैयारी की जरूरत सभी को है। आज परिवार में बिखराव के कारण मन अशांत रहता है और जीवन में वास्तव में जो आगे बढ़ने की संभावना है जो इतना अमूल्य जीवन मिला है उसका उपयोग नहीं कर पाते हैं। वह प्रयास और पुरुषार्थ भी खत्म हो जाता है। परिवार को एक प्रयोगशाला बनाएं और अच्छा जीवन जीना सीखो।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जीवन में कभी निंदा नहीं करना चाहिए। कभी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए। प्रतिकूल व्यक्ति की भी हमेशा प्रशंसा करना नहीं भूलना चाहिए। प्रतिकूल व्यक्ति के प्रति करुणा करना चाहिए। हमेशा सभी की निस्वार्थ सेवा करना चाहिए। प्रतिकूल व्यक्ति के लिए मौके का इंतजार करना चाहिए,जब जरूरत हो सेवा करते रहना चाहिए। ऐसा करने से देव,गुरु और धर्म का आशीर्वाद सदैव आप पर बना रहेगा। जीवन भी अच्छा होगा और शांति भी जीवन में बनी रहेगी। परिवार में अच्छा जीवन जीने का ट्रायल हो जाएगा तो कहीं भी आपका जीवन जीने का स्वाभाव वैसे ही रहेगा,संस्कार वैसे ही रहेंगे। देव ,गुरु धर्म और बड़ों के प्रति समर्पण रहेगा।