यज्ञभाव से दायित्व, संकल्प से संस्थान: कुलपति आचार्य वाजपेयी की पुनः कार्यारंभ प्रतिज्ञा
बिलासपुर |
2026-02-24 15:32:37
-अंकुर “विनोद” शुक्ल
बिलासपुर । प्रशासनिक औपचारिकताओं की प्रतीक्षा के बीच दायित्वों की सतत साधना का संदेश देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में सोमवार का प्रातःकाल एक विशेष आध्यात्मिक वातावरण का साक्षी बना। वैदिक मंत्रोच्चार, हवन की सुगंध और “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के उदात्त भाव के साथ कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ वाजपेयी ने विश्वविद्यालय परिवार के मध्य अपने कर्तव्य-पथ पर अविराम अग्रसर रहने का संकल्प दोहराया।
नवीन कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया अपने विधिसम्मत चरणों में अग्रसर है। ऐसे समय में संस्थागत निरंतरता और शैक्षणिक अनुशासन अक्षुण्ण रहे—इसी भावना के साथ वर्तमान कुलपति अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहेंगे। भारतीय परंपरा में कहा गया है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”—अर्थात कर्म ही हमारा अधिकार है, फल की चिंता नहीं। इसी कर्मयोग की भावना ने प्रशासनिक औपचारिकताओं से परे विश्वविद्यालय के संचालन को स्थिर और सकारात्मक बनाए रखा है।
कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में एक गरिमामय, संयमित और प्रेरणादायी वातावरण उपस्थित रहा। शिक्षकों, अधिकारियों और कर्मचारियों की सहभागिता ने यह संकेत दिया कि संस्था केवल भवनों से नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास और उत्तरदायित्व से निर्मित होती है।
कुलपति का विशेष वक्तव्य
इस अवसर पर कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ वाजपेयी ने कहा, “विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, यह मूल्य, परंपरा और राष्ट्रनिर्माण का प्राण-स्थान है। जब तक दायित्व मेरे हाथों में है, मैं इसे यज्ञ मानकर निभाऊँगा। हमारी प्राथमिकता शैक्षणिक गुणवत्ता, शोधोन्मुख दृष्टि और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को और सुदृढ़ करना है। नई नियुक्ति तक हम सब मिलकर संस्थान की गति और गरिमा को अक्षुण्ण रखेंगे। ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’—इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना है।”
उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार के सामूहिक सहयोग को संस्था की वास्तविक शक्ति बताते हुए कहा कि समर्पण, पारदर्शिता और सकारात्मक संवाद के माध्यम से विश्वविद्यालय नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर रहेगा।
भारतीय लोक में कहा गया है— “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”—प्रक्रियाएँ समय लेती हैं, किंतु धैर्य और दृढ़ता से ही स्थायी उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसी संतुलित दृष्टि के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है।
नवीन कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया अपने विधिसम्मत चरणों में अग्रसर है। ऐसे समय में संस्थागत निरंतरता और शैक्षणिक अनुशासन अक्षुण्ण रहे—इसी भावना के साथ वर्तमान कुलपति अपने दायित्वों का निर्वहन करते रहेंगे। भारतीय परंपरा में कहा गया है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”—अर्थात कर्म ही हमारा अधिकार है, फल की चिंता नहीं। इसी कर्मयोग की भावना ने प्रशासनिक औपचारिकताओं से परे विश्वविद्यालय के संचालन को स्थिर और सकारात्मक बनाए रखा है।
कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में एक गरिमामय, संयमित और प्रेरणादायी वातावरण उपस्थित रहा। शिक्षकों, अधिकारियों और कर्मचारियों की सहभागिता ने यह संकेत दिया कि संस्था केवल भवनों से नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास और उत्तरदायित्व से निर्मित होती है।
कुलपति का विशेष वक्तव्य
इस अवसर पर कुलपति आचार्य अरुण दिवाकर नाथ वाजपेयी ने कहा, “विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, यह मूल्य, परंपरा और राष्ट्रनिर्माण का प्राण-स्थान है। जब तक दायित्व मेरे हाथों में है, मैं इसे यज्ञ मानकर निभाऊँगा। हमारी प्राथमिकता शैक्षणिक गुणवत्ता, शोधोन्मुख दृष्टि और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को और सुदृढ़ करना है। नई नियुक्ति तक हम सब मिलकर संस्थान की गति और गरिमा को अक्षुण्ण रखेंगे। ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’—इसी विश्वास के साथ आगे बढ़ना है।”
उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार के सामूहिक सहयोग को संस्था की वास्तविक शक्ति बताते हुए कहा कि समर्पण, पारदर्शिता और सकारात्मक संवाद के माध्यम से विश्वविद्यालय नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर रहेगा।
भारतीय लोक में कहा गया है— “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”—प्रक्रियाएँ समय लेती हैं, किंतु धैर्य और दृढ़ता से ही स्थायी उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसी संतुलित दृष्टि के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है।
संस्था का संदेश स्पष्ट है— परिस्थितियाँ चाहे प्रतीक्षारत हों, पर प्रगति की धारा अविराम है।